माँ बेचती थी देशी शराब, कभी नहीं देख पाए पिता की शक्ल, झोपड़ी में रहने वाला ये लड़का ऐसे बना IAS

एक आम इंसान को अपने जीवन में कई प्रकार के तकलीफों और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इन चुनातियों से दबकर कुछ लोग हार मान लेते हैं, वही कुछ साहसी लोग इन्हें हराकर और मुश्किलों से उभर के बाहर आते हैं और अपनी एक अलग पहचान समाज में बनाते हैं।

आज हम आपको एक ऐसे ही लड़के की कहानी बताने जा रहें हैं, जिसके जीवन में ना जाने कितने ही प्रकार की मुश्किलें और चुनोतियाँ सामने आयी, पर वो सबको चीरते हुए बाहर निकले और उन्हें जीत हाथ लगी, इसके साथ ही उन्हें वो भी मिला, जिसका उन्होंने कभी सपना देखा था।

राजेंद्र भारुड़ (Rajendra Bharud) का जन्म 7 जनवरी 1988 को महाराष्ट्र के धुले जिले के समोडा में हुआ था। राजेंद्र का जन्म एक आदिवासी परिवार में हुआ था, उनसे बड़े उनके 1 भाई और 1 बहन थे। राजेंद्र कहते हैं की जब वो माँ की गर्भ में थे, तभी उनके पिता गुजर गए थे। उनका परिवार इतना गरीब था की उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे की वो 1 फोटो खिचवा सके। इसके कारण उनके घर में पिता की कोई तस्वीर भी नहीं थी। इसी वजह से राजेंद्र अपने पिता की कभी शक्ल तक नहीं देख पाए थे।

जब राजेंद्र की माँ प्रेग्नेंट थी, तब उन्हें गाँव के लोगों ने सलाह दिया था की वो तीसरे बच्चे को जन्म ना दें, लोगों ने कहा था की तू कैसे तीसरे बच्चे का पालन पोषण कर पाएगी, इसे पैदा मत कर। पर राजेंद्र की माँ ने किसी की नहीं सुनी और फिर राजेंद्र का जन्म हुआ। राजेंद्र का परिवार काफी गरीब था, जिसके कारण उनके पास पक्का घर भी नहीं था।

उनके परिवार को गन्ने की खरपतवार से निर्मित झोपड़ी में ही जीवन यापन करना पड़ता था। राजेंद्र कहते हैं की उनकी माँ रोज खेतों में मजदूरी के लिए जाया करती थी, पर वहां काम करने के बाद भी इतने रूपए नहीं मिल पाते थे, जिस से घर खर्च निकाला जा सके।

इसलिए उनकी माँ ने देशी शराब का बिजनेस शुरू कर दिया, ये शराब महुआ के बीज से बनाये जाते थे। आदिवासी छेत्रों में ऐसे शराब का चलन था, इसे वहां गैरकानूनी भी नहीं माना जाता है। जिसके वजह से ये आसानी से उन इलाकों में खरीदे और बेचे जाते थे।

राजेंद्र बचपन से ही पढाई में काफी होशियार छात्र थे, जब वो सिर्फ 5 वीं कक्षा में थे, तभी उनके शिक्षकों को इस बात का अनुमान हो गया था की राजेंद्र का दिमाग काफी तेजी है, और वो चीजों को जल्दी समझ जाते हैं।

इसलिए उनके शिक्षकों ने ये बात उनकी माँ को बताई, और ये भी कहा की अगर राजेंद्र को अच्छी शिक्षा मिलती है, तो ये लड़का आगे जाके बहुत अच्छा कर सकता है। राजेंद्र कहते हैं की इसके बाद उनकी माँ ने उनकी पढाई को और भी ज्यादा गंभीरता से लिया।

उन्हें पढ़ाने के लिए जवाहर नवोदय विधालय भेज दिया गया जोकि उनके गांव से करीब 150 किमी की दुरी पर था। राजेंद्र कहते हैं मेरे पढ़ने जाने के बाद भी मेरी माँ ने शराब के बिजनेस को जारी रखा था।

जब वो छुट्टी में घर आते थे, तब वो भी माँ का हाथ बटाते थे पर उनकी माँ उन्हें कभी भी शराब नहीं बनाने देती थी, वो दूकान पर आये लोगों को स्नैक्स और शोडा दिया करते थे। नवोदय विधालय जाने के बाद से राजेंद्र के जीवन में काफी सकारत्मक बदलाव आये और उनका झुकाव गणित और विज्ञान की तरफ होने लगा था।

राजेंद्र ने 10 वीं की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करते हुए 95% अंक हासिल किये और 12 वीं में भी उन्हें 90% मार्क्स मिले। राजेंद्र हमेशा से टॉपर रहे थे, अपनी पढाई के प्रति वो बहुत ईमानदार थे जिसका नतीजा अब उन्हें मिलना शुरू हो गया था।

काफी अच्छे मार्क्स आने की वजह से राजेंद्र का दाखिला सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज में हो गया, अब वो मेडिकल की पढाई में लग गए थे, राजेंद्र कहते हैं की बचपन से वो डॉक्टर बनाना चाहते थे, जिस से की वो अधिक से अधिक लोगों की मदद कर पाए, पर वो जैस-जैसे बड़े हुए फिर उन्हें पता चला की लोगों की मदद करने के लिए, उन्हें शिक्षित करना होगा और जीवन के लिए बेहतर बुनियादी सविधाएँ मुहैया करनी होगी,  पर इन सब के लिए उन्हें IAS बनना होगा।

राजेंद्र कहते हैं की मेडिकल के साथ साथ अब वो यूपीएससी की तैयारी में पुरे जी जान के साथ जुट गए थे, वो अपनी पढाई के काफी केंद्रित थे और बाकि कॉलेज के छात्रों की तरह बहार घूमने, डेट पर जाने और मस्ती करने में समय बर्बाद नहीं किया करते थे। राजेंद्र कहते हैं की उनके जीवन में रूटीन का काफी महत्व है और वो सारे कामों को समय से किया करते थे।

जिसके वजह से चीजों को अच्छे से मैनेज करने में सफल हुए। राजेंद्र जब अपने एमबीबीएस के आखिरी वर्ष में थे तभी उन्हें यूपीएस की परीक्षा भी थी। दोनों परीक्षाओं के लिए उन्होंने खूब मेहनत किया, पर उन्हें सबसे बड़ी सफलता तब मिली, जब वो यूपीएससी की परीक्षा देते हुए पहले ही प्रयास में सफल हुए और यूपीएससी में उनका चयन हो गया।

राजेंद्र कहते हैं की उनकी माँ को तब पता था की मेरा बेटा डॉकटर बनने वाला है, उन्हें यूपीएससी क्या होता इसके बारे में कुछ पता नहीं था, फिर जब गाँव जाके राजेंद्र ने अपनी माँ से कहा की वो कलेक्टर बनने वाले हैं तब वो काफी खुश हुई।

राजेंद्र कहते हैं की गाँव के वो लोग जो बचपन में उन्हें हीन भावना से देखते थे, अब वो भी उन्हें आदर से देख रहे थे और सम्मान दे रहे थे। राजेंद्र कहते हैं की उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा तो पास कर ली थी पर उनका सपना अब आईएएस बनने का था जो प्रथम प्रयास में पूरा नहीं हो पाया था।

इसलिए उन्होंने फिर से UPSC की परीक्षा दी और इस बार उनकी मेहनत रंग लाइ और आखिरकार वो IAS बनने में सफल रहे। जुलाई 2018 में राजेंद्र को नंदुरबार का डीएम बनाया गया था। तब से वो आम जन के लिए अनेकों प्रेरक काम कर रहे हैं।

राजेंद्र भारुड़ की कहानी हमें ये बताती है की अगर एक इंसान, चाहे भले ही वो कितना ही असहाय और गरीब क्यों न हो, अगर वो अपने जीवन में अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर है और वो उसे हासिल करने के लिए जी तोड़ महेनत करने के लिए तैयार है, फिर उसे अपनी मंजिल तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता।

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