हुमायूं की विजय और पराजय के किस्से!

भारत में पहले मुगल बादशाह बाबर या ज़हीरूद्दन मुहम्मद के चार पुत्रों में हुमायूं सबसे बड़ा था.

भारतीय इतिहास में हुमायूं के नाम से मशहूर यह दूसरा मुगल शासक नसीरूद्दीन मुहम्मद के नाम से भी जाना जाता है.

6 मार्च 1508 ई. को काबुल में पैदा हुआ हुमायूं महज़ 12 वर्ष की अल्पायु में बदख़्शां का सूबेदार नियुक्त कर दिया गया था.

इसने यहां बाबर के नेतृत्व में लगभग सभी अभियानों में हिस्सा लिया.

बाबर ने अपनी मौत के पहले ही हुमायूं को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.

और इस तरह 26 दिसंबर 1530 ई. को बाबर की मौत के साथ ही 30 दिसंबर 1530 को हुमायूं का राज्याभिषेक कर दिया गया.

उत्तर भारत के कुछ हिस्सों समेत अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक फैले साम्राज्य में हुमायूं ने 1530-40 और 1555-56 के दो कालखंडों में शासन किया.

ऐसे में यह जानना दिलचस्प रहेगा कि हुमायूं के साम्राज्य विस्तार में कौन-कौन सी जीत अहम रहीं.

तो चलिए जानते हैं भारत पर शासन करने वाले दूसरे मुगल बादशाह हुमायूं की कहानी –

शेरशाह सूरी बना बड़ी चुनौती

मुगल साम्राज्य की शासन व्यवस्था हुमायूं के हाथ में आने के बाद उसके संघर्ष की शुरूआत अफ़गान सरदार महमूद लोदी से हुई.

महमूद लोदी की अफगान सेना और हुमायूं की सेना के बीच 1532 ई. में दौहरिया युद्ध हुआ, इसमें जीत हुमायूं की हुई.

बहरहाल, हुमायूं का आफ़गान शासक शेर खां या शेरशाह सूरी से संघर्ष का सिलसिला चुनार के घेरे से शुरू हुआ. इसमें समझौते के तहत शेर खां ने हुमायूं की अधीनता स्वीकार करते हुए अपने पुत्र कुतुब खां के नेतृत्व में एक अफगान सैन्य टुकड़ी हुमायूं के साथ भेज दी.

हुमायूं वापस आगरा लौट आया और लगभग डेढ़ साल तक ऐश-ओ-आराम में अपनी जिंदगी बिताई.

 

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Sher Shah Suri. (Pic: academichub)

बहादुरशाह को चित्तौड़ के किले से खदेड़ा

यही वह वक़्त था, जब हुमायूं गुजरात में बहादुरशाह की बढ़ती ताक़त को चुनौती देने की जुगत में था.

तब शेर खां अपनी शक्तियों को विस्तार दे रहा था, ताकि हुमायूं का सामना कर सके.

गुजरात का शासक बहादुरशाह इस समय तक दक्षिण भारत के कई राजाओं से संधि कर चुका था. उसने मालवा, रायसीन और मेवाड़ को संधि करने पर मजबूर कर दिया.

तुर्की के प्रसिद्ध तोपची रूमी खां की सहायता से उसने तोपखाना स्थापित किया. वह दिल्ली, आगरा तक राज्य विस्तार की कल्पना कर चुका था.

अपनी रणनीति के तहत बहादुरशाह ने हुमायूं के सभी शत्रुओं को शरण दे रखी थी.

यह सब देखते हुए हुमायूं ने बहादुरशाह से युद्ध का फैसला किया.

इस समय बहादुरशाह ने चित्तौड़ के किले पर घेरा डाल दिया था. उस समय वहां के शासक विक्रमाजीत थे.

विक्रमाजीत की मां और राजमाता कर्णावती ने हुमायूं से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई. उसी समय बहादुरशाह ने भी धर्म की रक्षा के नाम पर हुमायूं से खुद पर आक्रमण न करने की प्रार्थना की.

धर्म के नाम पर हुमायूं ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, लेकिन अपनी सैन्य तैयारियों में लगा रहा.

वहीं, बहादुहशाह ने भयंकर लूटमार जारी रखी.

इस बात का पता जैसे ही हुमायूं को चला, उसने चित्तौड़ को जाने वाले रसद मार्ग पर कब्जा कर लिया. बहादुरशाह ने युद्ध न करके रक्षात्मक नीति अपनाई, हालांकि हुमायूं ने भी हमला नहीं किया.

रसद की कमी के कारण बहादुरशाह की सेना भूख से तड़फने लगी.

अंततः बहादुरशाह चित्तौड़ किले को छोड़ कर मांडू की तरफ भाग गया. फिर वहां से चम्पानेर और चम्पानेर से कांबे की ओर चला गया.

हुमायूं ने उसका कांबे तक पीछा किया, लेकिन बाद में चम्पानेर विजय के लिए वह वापस लौट आया.

अब संपूर्ण मालवा और गुजरात हुमायूं के हाथों में आ चुका था.

हालांकि, उसी समय कुछ रणनीतिक गलतियों के चलते हुमायूं फिर से मालवा और गुजरात खो बैठा.

कहा जाता है कि हुमायूं ने एक ही साल में पूरा गुजरात और मालवा जीता और खो भी दिया.

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Battle Field of Chausa. (Representative Pic: Magnificent Bihar)

 

…और हुमायूं सत्ता से बेदखल हो गया

शेर खां-हुमायूं के बीच संघर्ष की दूसरी पारी 1537 ई में सामने आई.

शेर खां ने 1534 में अपने बंगाल अभियान के दौरान सूरजगढ़ के युद्ध में सफलता प्राप्त की और उसकी संपत्ति को लूट लिया.

हुमायूं के खिलाफ यह उसकी भविष्य की तैयारी थी, जो 26 जून 1539 ई. को चौसा के युद्ध में काम आई. इस युद्ध में हुमायूं की सेना में भारी तबाही हुई और शेर खां विजयी रहा.

हुमायूं इस युद्ध में जैसे-तैसे जान बचाकर भागा.

इसके बाद संघर्ष का सिलसिला यहीं नहीं रुका. 17 मई 1540 ई. को बिलग्राम के युद्ध में शेरशाह के हाथों हुमायूं की पराजय हुई.

इसी हार के साथ हुमायूं के हाथों से आगरा और दिल्ली भी निकल गया. अब उसकी जान के भी लाले पड़ गए, सो वो बड़ी चतुराई से भारत छोड़कर भाग निकला.

हुमायूं की पहली पारी के अंत के साथ ही अब मुगल सत्ता से बेदखल हो चुके थे.

कंधार और काबुल को जीत दिल्ली पहुंचा

चौसा और बिलग्राम के युद्ध में पराजय से हतोत्साहित हुमायूं सिंध चला गया.

उसने भारत पर दोबारा राज करने के उद्देश्य से 15 साल तक घुमक्कड़ी का जीवन व्यतीत किया.

इस दौरान वह सूफीवाद की तरफ आकर्षित हुआ और सूफीसंत शेख मुहम्मद गौस के बड़े भाई शेख बहलोल का शिष्य बन गया.

हुमायूं ने 1541 में हमीदा बेगम से शादी कर ली. इसी हमीदा की कोख से अकबर का जन्म हुआ.

हालांकि, हुमायूं को अपनी हार कचोटती रही और वह अपनी जीत के ख्बाव बुनने लगा.

ऐसे में उसने सबसे पहले कामरान मिर्ज़ा द्वारा हथियाए गए काबुल को छीना, बाद में कंधार पर भी अपना कब्जा जमाया.

यहीं से हुमायूं की सत्ता में दूसरी पारी की शुरुआत हुई.

सतलुज नदी के किनारे 15 मई 1555 ई. को मच्छीवारा के युद्ध में हुमायूं ने अफ़गान सरदार नसीब खां को पराजित कर दिया.

इसके बाद, 22 जून 1555 ई. को सरहिंद के मैदान पर अफ़गान शासक सिकंदर सूर और मुगल सेना के बीच दोबारा से लड़ाई हुई. बैरम खां के नेतृत्व में लड़ा गया ये युद्ध भी मुगल जीत चुके थे.

और इसी के साथ 23 जुलाई 1555 ई. को एक बार फिर हुमायूं ने दिल्ली के तख़्त-ओ-ताज़ को हासिल कर लिया.

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Humayun the Second Mughal Emperor. (Representative Pic: farbound)

हुमायूं इसी जीत के साथ बौरा गया और लगभग छह महीने बाद ही 26 जनवरी 1556 ई. को दीनपनाह भवन की सीढ़ियों से उतरते वक़्त हुमायूं की गिरने से मौत हो गई.

ऐसे में कहा जा सकता है कि हुमायूं जिस तरह से अपनी पूरी ज़िंदगी गिरते-पड़ते चलता रहा, ठीक उसी प्रकार से एक सीढ़ी से गिरने के कारण उसकी मौत हो गई.