कंगाली में बिस्कुट खाई, ट्रेन में बैठकर करनी पड़ी पढाई, फिर भी नहीं हारे और UPSC टॉप किया

भारत की सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा में पास होकर अफसर बनना लाखों युवाओं का सपना होता है। इसके लिए देश के युवा जो इस परीक्षा में सफल होना चाहते हैं, वो जी तोड़ मेहनत भी करते हैं। सबका सपना यही होता है की वो कामयाबी पा सके, पर सफलता इतनी आसानी से मिलती। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिन्होंने हार ना मानने की जैसे कसम खाई हो, और जब तक वो सफल नहीं होते रुकते नहीं हैं।

आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी बताने जा रहें हैं, जिनके सामने जीवन में ना जाने कितनी समस्याऐं आयी पर वो लड़े और उस से जीत कर बाहर आये। मेरठ के रहने वाले शशांक मिश्रा की कहानी भी काफी संघर्ष पूर्ण और चुनातियों से भरी रही है। शशांक मिश्रा का जीवन 12 वीं की कक्षा तक काफी अच्छा चल रहा था तथा उनके परिवार में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी।

पर उसी वर्ष अचानक शशांक के पिता की मृत्य हो गयी, उनके पिता तब कृषि विभाग में डेपुटी कमिश्नर हुआ करते थे। पिता के गुजरने के बाद शशांक के घर में पैसे की तंगी आ गयी थी, बता दें की शशांक के 3 भाई, और 1 बहन थी, इनके बाद माँ, अब सबकी जिम्मेदारी शशांक के कंधे पर ही आ गयी थी।

शशांक मिश्रा का बचपन से ही झुकाव आईआईटी की तरफ था, पिता के गुजरने के अगले वर्ष ही उनकी परीक्षा भी थी, ऐसे समय में किसी भी बेटे के लिए जिसके पिता हाल ही में गुजरे हों, पूरी फोकस के साथ एग्जाम देना और तयारी करना आसान नहीं होता, पर शशांक ने हार नहीं मानी और वो आईआईटी की परीक्षा में शामिल हुए।

उन्हें इस परीक्षा में जबरदस्त सफलता हाथ लगी और पुरे देश में उन्हें आईआईटी में 137 वां स्थान हासिल हुआ। इसके बाद शशांक ने अपना दाखिला एलेक्ट्रियल इंजीनियरिंग में करवाया और उन्होंने इसी विषय से अपनी इंजीनियरिंग की पढाई काफी अच्छे मार्क्स से पास की। शशांक को कॉलेज में हुए कैंपस प्लेसमेंट में एक मल्टी नेशनल कंपनी से काफी अच्छी नौकरी मिली।

अब ऐसा लग रहा था की शशांक की जिंदगी वापस से पटरी पर आ रही थी। पर शशांक को अपने काम में मन नहीं लगा, अब वो कुछ और करना चाहते थे, शशांक ने अपने जीवन में बड़ा फैसला लेते हुए 2004 में नौकरी से इस्तीफा दे दिया, अब उन्होंने यूपीएससी की तैयारी करके प्रशासनिक सेवा में जाने का निश्चय कर लिया था। पर यहाँ से उनका रास्ता बहुत कठिन और चुनौती भरा होनेवाला था, शायद इस बात का उन्हें खुद भी अंदाजा नहीं था।

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शशांक ने आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली जाने का निश्चय किया, पर यहाँ आने के बाद उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, दिल्ली जैसे बड़े शहर में गुजारा करना इतना आसान नहीं था। ऐसे में शशांक मिश्रा को पैसे की कमी होने लगी, इस समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने दिल्ली की ही एक कोचिंग में पढ़ना शुरू कर दिया, ये सोचकर कर की इस से शायद उनकी तकलीफ दूर हो जाए।

पर कोचिंग में पढ़ाने के बाद भी उन्हें इतनी सैलरी नहीं मिलती थी, जिस से की वो दिल्ली जैसे बड़े शहर में आसानी से रह पाए। अब उनके सामने फिर से समस्या खड़ी थी, इसका हल निकालने के लिए शशांक ने मेरठ में कमरा किराये पर लेने के निश्चय कर लिया, अब वो रोज मेरठ से दिल्ली आने जाने लगे थे।

पर रास्ते में आने जाने में उनका काफी समय बर्बाद हो रहा था, इस समस्या को देखते हुए उन्होंने ट्रेन में ही पढ़ना शुरू कर दिया, जिसके वजह से वो रास्ते के समय का सदुपयोग कर पाते थे। शशांक के लिए राह अभी भी मुश्किल थी, ऐसा लग रहा था जैसे मानों एक के बाद एक समस्याऐं उनके पीछे हाथ धोके पड़ी हुई है।

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कभी कभी उन्हें पैसों की ऐसी तंगी हो जाती थी की, उन्हें बिस्कुट खाकर ही रात में सोना पड़ता था, पर इन सारी समस्याओं के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और निरंतर अपनी तैयारी में लगे रहे, वो जानते थे की ये परीक्षा काफी कठिन है, इसलिए उन्होंने जल्दबाजी नहीं की और 2 साल तक लगातार पढाई करते रहे।

पहली बार उन्होंने UPSC की परीक्षा साल 2006 में दी और इस परीक्षा का परिणाम उनके लिए काफी उत्साह वर्धक था, पहले ही प्रयास में वो इस कठिन एग्जाम में सफल हुए, पर ज्यादा अच्छी रैंक न मिलने की वजह से उन्हें UPSC के A ग्रेड सर्विसेज के लिए चुना गया। पर शशांक इतने से कहां खुश होने वाले थे, उन्हें तो IAS बनना था।

इसलिए उन्होंने 1 साल और जमके तैयारी की और इस बार उन्होंने कमाल कर दिया, साल 2007 में हुए सिविल सर्विसेज की परीक्षा में शशांक को बहुत बड़ी सफलता मिली और उन्हें टॉप 10 में स्थान मिला, इसके साथ ही शशांक को पुरे भारत में 5 वां स्थान प्राप्त हुआ, अब वो आईएएस की कुर्सी तक पहुंच गए थे।

शशांक मिश्रा की कहानी हजारों सिविल सर्विसेज की परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को प्रेरित करती है, इनकी कहानी हमें ये भी बताती है की चाहे हालत कैसे भी हों, अगर हम निरंतर कोशिश करते गए, तो हमें जीतने से कोई नहीं रोक सकता।

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